उपलब्धिया

1. आयुर्वेद, यूनानी एवं सिद्ध के पाठ्यक्रम का अनुवाद : पिछले 37 वर्षों से (परिषद् की स्थापना से ) आयुर्वेद, यूनानी एवं सिद्ध के स्नातकीय तथा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम क्रमशः संस्कृत, उर्दू तथा तमिल भाषाओं में थे| भाषा रूपी व्यवधान देश के अंदर तथा बाहर इन पद्धतियों की सफलता तथा लोकप्रियता के मार्ग में बाधा डाल रहा था| वर्तमान परिषद् आगे आई तथा भारतीय चिकित्सा पद्धति को लोकप्रिय बनाने हेतु कदम उठाये गए| परिषद् ने तीनों चिकित्सा पद्धतियों के सम्पूर्ण पाठ्यक्रम का अनुवाद अंग्रेजी में, जो की विश्व स्तर पर अपनायी गई भाषा है, पूर्ण करने का कार्य सफलतापूर्वक पूरा किया| श्रीमती अनीता दास, पूर्व सचिव, आयुष ने भी इसकी सलाह दी थी | यह चुनौतीपूर्ण कार्य छ: माह की बहुत छोटी अवधि में पूर्ण किया गया |

2. पाठ्यविवरण का अधतन: आयुर्वेद, यूनानी तथा सिद्ध के स्नातकीय तथा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के पाठ्यविवरणों का अद्यतन बहुत लम्बे समय से नहीं हुआ था| वर्तमान परिषद् ने सभी तीन पद्धतियों के स्नातकीय तथा स्नातकोत्तर पाठ्यविवरणों का अधतन किया तथा यह सम्पूर्ण देश में इस सत्र से लागू है|

3. नए स्नातकोत्तर डिप्लोमा पाठ्यक्रम का प्रारम्भ : परिषद् ने भारतीय चिकित्सा पद्धति की विशिष्ट सेवाए उपलब्ध कराने तथा इन प्राचीन पद्धतियों के लाभों को बढ़ाने के लिए 16 विषयों में नये आयुर्वेद स्नातकोत्तर डिप्लोमा पाठ्यक्रम की रूपरेखा तैयार की | आयुर्वेद में नया स्नातकोत्तर डिप्लोमा कोर्स प्रारम्भ करने का उददेश्य आयुर्वेद के विशेषज्ञ तैयार करना है जो आयुर्वेद से अधिक विशवास के साथ तथा सफलतापूर्वक चिकित्साभ्यास कर सके | ये सभी स्नातकोत्तर डिप्लोमा पाठ्यक्रम निर्णय / इस सत्र से प्रारम्भ हुये | यह बहुत ही प्रोत्साहनपूर्ण बात है की नये आयुर्वेद स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम का कार्यान्वयन इस वर्ष से हो चुका है स्नातकोत्तर डिप्लोमा पाठ्यक्रम का यह प्रावधान यूनानी तथा सिद्ध पद्धतियों में पहले से ही है तथा इस पर कार्य हो रहा है |

4. भारतीय चिकित्सा पद्धति के वर्तमान मानकच्युत महाविधालयों के विरुद्ध कार्यवाही : भारतीय चिकित्सा पद्धति के महाविधालयों के मानक स्नातकीय तथा स्नातकोत्तर विद्वानों से प्रतिबिम्बित होते हैं| वर्ष 2008-09 से पूर्व अनेक मानकच्युत महाविधालय चल रहे थे तथा वे छात्रों का भविष्य निर्धारित कर रहे थे | वर्तमान परिषद् ने मामले को गम्भीरता से लिया तथा शिक्षा के मानकों के साथ बिना कोई समझौता किये, परिषद् ने अपनी संस्तुतियां वापस ले ली, जिससे अन्तत: मान्यताच्युत महाविधालयो में प्रवेश बन्द हो गये | इन महाविधालयों तथा अस्पतालों के न्यूनतम मानकों एवं आवश्यकताओं का अवलोकन करने के पश्चात् परिदर्शन प्रतिवेदन की एक कड़ी संवीक्षा की गई तथा 84 आयुर्वेद, 26 यूनानी तथा 03 सिद्ध महाविधालयों (2008-09) तथा 64 आयुर्वेद, 01 सिद्ध तथा 08 यूनानी महाविधालयों (2009-10) तथा 55 आयुर्वेद, और 01 यूनानी महाविधालय (2010-11) को प्रवेश लेने की अनुमति नही दी गई है | यहाँ पर यह भी उल्लेखनीय है की इस परिषद् के आने से पूर्व किसी भी महाविधालय को अनुमति मना नही की गई थी |

भारतीय चिकित्सा केन्द्रीय परिषद् द्वारा विहित न्यूनतम मानकों के अनुसार शिक्षण स्टाफ के साथ शिक्षण एवं प्रायोगिक प्रशिक्षण की सुविधाओं के वास्तविक मूल्याकंन को उन्नत करने के लिए निम्नलिखित कार्यवाही प्रारम्भ हो चुकी हैं :-

क. शिक्षण स्टाफ का डाटा बेस तैयार किया जाना : समय-समय पर आयुर्वेद, सिद्ध एवं यूनानी के परिदर्शन प्रतिवेदन की अच्छी तरह से जाँच कि गई | यह पाया गया कि कई शिक्षकों के नाम एक से अधिक महाविधालयों में हैं तथा शिक्षकों ने झूठे अनुभव प्रमाण पत्र प्रस्तुत किये हैं|

भारतीय चिकित्सा पद्धति के सभी शिक्षकों का डाटा-बेस तैयार किया जाना परिषद् द्वारा सम्पादित किया गया एक अधिक चुनौतीपूर्ण कार्य था | डाटा बेस तैयार करने का उददेश्य भारतीय चिकित्सा पद्धति के सभी शिक्षकों का रिकार्ड रखना तथा उनकी पात्रता का मूल्यांकन करना है | तथापि सभी प्रयास किये गये तथा कायार्लय द्वारा प्रथम दृष्ट्या डाटा-बेस तैयार किये गये | शिक्षण स्टाफ का डाटा-बेस उनके अन्य विवरण के साथ भारतीय चिकित्सा केन्द्रीय परिषद् के कार्यालय में तैयार किये जा रहे हैं तथा डुप्लीकेसी इत्यादि निकालने के लिए समय-समय पर इनका अधतन किया जा रहा हैं | तथापि परिषद् द्वारा तैयार किया गया शिक्षकों का डाटा-बेस भारतीय चिकित्सा पद्धति के महाविधालयों के शिक्षकों के कदाचार को रोकने हेतु एक महत्वपूर्ण साधन सिद्ध हुआ | वर्तमान परिषद् ने लगभग 400 ऐसे शिक्षकों पहचान की जिन्होंने झूठे शिक्षण अनुभव प्रमाण- पत्र प्रस्तुत किये थे तथा लगभग 1000 शिक्षक डुप्लीकेसी में पाए गये | परिषद् ने उन्हे शिक्षण हेतु अपात्र कर दिया| इस सम्बन्ध में मामले को स्पष्ट करने हेतु सम्बन्धित महाविधालयों तथा शिक्षकों को पत्र जारी किये गये | इस मामले में कार्यवाही प्रगति पर है तथा पहचान - पत्र जारी किये जाने कि प्रक्रिया प्रगति पर है |

ख. आयुर्वेद, यूनानी एवं सिद्ध महाविधालयों में शिक्षण स्टाफ की नियुक्ति: महाविधालयों के न्यूनतम मानक एवं आवश्यकताओं का सख्ती के साथ अवलोकन करने से तथा सरकारी महाविधालयों एवं गैर-सरकारी महाविधालयों को सहायता अनुदान की अनुमति न देकर तथा भारतीय चिकित्सा केन्द्रीय परिषद् के लगातार दबाव से इन महाविधालयों में 4000 से अधिक शिक्षक नियुक्त किये जा चुके हैं | यहाँ यह भी उल्लेखनीय है की राज्य सरकारों ने भी भारतीय चिकित्सा केन्द्रीय परिषद् द्वारा विहित किये गये न्यूनतम मानकों के अनुसार स्टाफ की संख्या बढ़ाने हेतु शिक्षण स्टाफ नियुक्त करने में काफी रूचि ली |

ग. महाविधालय तथा अस्पताल की ईमारत का निर्माण: न्यूनतम मानकों तथा आवश्यकताओं का सख्ती से अवलोकन किये जाने से गैर-सरकारी महाविधालयों के प्रबन्धन तथा राज्य सरकारों ने क्षेत्र को भारतीय चिकित्सा केन्द्रीय परिषद् के न्यूनतम मानकों तथा आवश्यकताओं के अनुसार करने हेतु इमारत का निर्माण किया |

घ. अस्पताल की कार्यप्रणाली में सुधार : ओ. पी. डी. (100 प्रतिदिन ) में रोगी की दैनिक औसत उपस्थिति तथा आई. पी. डी. में शयया अधिभोग (न्यूनतम 40%) का मानक निश्चित करने से सक्षम प्राधिकारियों ने अस्पताल की कार्यप्रणाली को उन्नत करने में अधिक रूचि ली |

5. विनियमों का संशोधन : वर्तमान परिषद् ने भारतीय चिकित्सा पद्धति को अधिक व्यावहारिक बनाने के लिए तीनों पद्धतियों के सभी विषय विशेषज्ञों /श्रेष्ट शिक्षको के साथ अनेक बैठकें की ताकि भारतीय चिकित्सा पद्धति के अर्हता प्राप्त डॉक्टर कुशल चिकित्साभ्यासी, अनुसंधानकर्ता तथा वैज्ञानिक बन सकें तथा जन - समुदाय को सर्वोत्तम सेवायें उपलब्ध करा सकें |

6. आयुर्वेद, यूनानी तथा सिद्ध महाविधालयों तथा अस्पतालों के न्यूनतम मानक तथा अपेक्षाओं का संशोधन : सभी तीन भारतीय चिकित्सा पद्धति की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए आयुष विभाग के परामर्श से आयुर्वेद, यूनानी तथा सिद्ध पद्धतियों के न्यूनतम मानकों का वर्तमान परिदृश्य की आवश्यकताओं के अनुसार पुनर्विलोकन किया गया तथा यह मामला भारत सरकार, आयुष-विभाग से अनुमोदन हेतु प्रतीक्षित है (न्यूनतम मानक तथा अपेक्षाएं विनिमय परिषद् के प्रारम्भ से आज तक अधिसूचित नही हुआ है)

7. भारतीय चिकित्सा के केन्द्रीय पंजिका का अधतन एवं रख - रखाव करना तथा अधतनीकृत राज्य पंजिका की समय पर आपूर्ति तथा भारतीय चिकित्सा पद्धति के चिकित्सभ्यासियों द्वारा उनके व्यावसायिक आचरण तथा शिष्टाचार, कर्तव्य तथा दायित्वों का अनुपालन : राज्य पंजिका प्रस्तुत न करने / विलम्ब प्रस्तुतीकरण के कारण भारतीय चिकित्सा की केन्द्रीय पंजिका अधतनीकरन तथा रख - रखाव करना बहुत कठिन था | अत: इसे सुनिश्चित करने हेतु राज्य बोर्डो / परिषदों के अध्यक्षों तथा रजिस्ट्रारों की दो बैठकें आयोजित की गई जिससे राज्य बोर्डो / परिषदों की भारतीय चिकित्सा की केन्द्रीय पंजिका के अधतन तथा आपूर्ति की समस्या का निराकरण किया जा सकें | भारतीय चिकित्सा पद्धति के चिकित्सभ्यासियों तथा उनके रोगियों के बीच बंधन को मजबूत बनाने पर जोर दिया ताकि चिकित्साभ्यासी प्रभावशाली ढंग से अपने कर्तव्य निभा सके, उत्तरदायित्व के साथ - साथ समाज की सेवा कर सकें तथा रोगियों की उपेक्षा न हो | व्यावसायिक आचरण तथा शिष्टाचार का अनुपालन करते हुए, भारतीय चिकित्सा पद्धति के चिकित्साभ्यासी चिकित्सा-व्यवसाय की गरिमा बनाये ररखेंगे |

वर्तमान परिषद् के कार्यकाल के दौरान भारतीय चिकित्सा की केन्द्रीय पंजिका का अधतन तथा पुनर्विलोकन किया गया | सम्पूर्ण देश से लगभग 1.3 लाख चिकित्सभ्यासियों के नाम भारतीय चिकित्सा केन्द्रीय परिषद् की वेबसाईट पर अपलोड किये गये, अत: चिकित्साभ्यासी भारतीय चिकित्सा की केन्द्रीय पंजिका में अपने नाम की प्रविष्टि सुनिश्चित कर सकते हैं तथा भारत में कहीं भी चिकित्साभ्यास कर सकते है| इसके अतिरिक्त भारत के सभी राज्य के आयुर्वेद, यूनानी तथा सिद्ध चिकित्सभ्यासियों के नाम केन्द्रीय पंजिका में पंजीकृत हुए तथा उनके नाम राजपत्र अधिसूचना में प्रकाशित किये गये|

8. भारतीय चिकित्सा केन्द्रीय परिषद् अधिनियम, 1970 की द्वितीय अनुसूची का संसोधन : परिषद् ने देखा कि विभिन्न बोर्ड/विश्वविधालयों द्वारा संचालित 200-250 डिग्री / डिप्लोमा कोर्स ऐसे थे जिनका संचालन भारतीय चिकित्सा केन्द्रीय परिषद् के प्रारम्भ से पूर्व ही बंद कर दिया गया था परन्तु ऐसे डिग्री/ डिप्लोमा कोर्स का नाम द्वितीय अनुसूची में अभी भी मौजूद था | इन कोर्सों के सामने अंतिम वर्ष का उल्लेख नही था | इस कारण से, ऐसे बहुत से डिग्री/ डिप्लोमा धारकों ने अपने नामांकन के लिए केस दर्ज कराया तथा उत्तर प्रदेश के एक डिप्लोमा धारक ने माननीय उच्च न्यायालय के आदेश से नामांकन भी प्राप्त किया | परिषद् ने मामले को गम्भीरता से लिया तथा इन डिग्री/ डिप्लोमा धारकों के नामांकन को रोकने के लिए सरकारी स्तर पर बात कि ऐसे डिग्री/ डिप्लोमा कोर्स प्रदान करने वाले बोर्ड/विश्वविधालयों के नाम के सामने अंतिम वर्ष डालने हेतु सम्बन्धित दस्तावेज एकत्र किये तथा सफलतापूर्वक इसे राजपत्र में अधिसूचित कराया |

9. पारदर्शिता जारी रखना : . पारदर्शिता बनाये रखने के लिये, भारतीय चिकित्सा केन्द्रीय परिषद् की स्थापना अर्थात 1971 से अब तक के कार्यकारिणी समिति तथा केन्द्रीय परिषद् की बैठकों के कार्यवृत्त परिषद् की वेबसाईट पर अपलोड किये गए |

10. विषय विशेषज्ञों को मेहनताना : यह देखा गया कि परिषद् के महत्वपूर्ण कार्य जैसे पाठ्यक्रम तैयार करना, विनिमय का प्रारूप तैयार करना तथा अन्य सम्बन्धित शैक्षिक कार्य हेतु जब कभी विषय विशेषज्ञों को बुलाया जाता था तो बैठकों/कार्यशालाओ में उपस्थित होने में उनकी कभी कोई रूचि नही होती थी क्योंकि उन्हें कोई मेहनताना नही दिया जाता था | उनकी महत्वपूर्ण भूमिका तथा शैक्षिक विशिष्टता पर विचार करते हुये वर्तमान परिषद् ने भारत सरकार के अनुमोदन से उनको परिषद् की ऐसी बैठकों के लिये रु.1500 / - प्रतिदिन देने का निर्णय लिया ताकि वे परिषद् को अपनी विशिष्ट सेवाएं बेहिचक उपलब्ध करा सकें |इस पर होने वाला व्यय भारतीय चिकित्सा केन्द्रीय परिषद् द्वारा अपनी स्रोतों से किया जाता है |

11. विश्व आयुर्वेद दिवस, विश्व यूनानी दिवस तथा विश्व सिद्ध दिवस की घोषणा का प्रस्ताव : आयुर्वेद, यूनानी तथा सिद्ध दिवस को प्रत्येक वर्ष. विश्व आयुर्वेद दिवस (दिसम्बर 28), विश्व यूनानी दिवस (4 अक्टूबर) तथा विश्व सिद्ध दिवस (14 अप्रैल) के रूप मनाने में का प्रस्ताव रखा जोड़ा गया | ये प्रस्ताव भारत सरकार को घोषणा हेतु भेजे गये |

12. आय संग्रहण : भारतीय चिकित्सा पद्धति के महाविधालय परिषद् को अपना परिदर्शन शुल्क नियमत रूप से नही भेज रहे थे तथा भारतीय चिकित्सा पद्धति के महाविधालयों पर एक बहुत बड़ी राशि रुकी हुई थी | मात्र वर्तमान परिषद् द्वारा इस सम्बन्ध में कड़ी कार्यवाही करने के पश्चात ही महाविधालयों ने उनका लन्बित मान्यत शुल्क भेजना प्रारम्भ किया तथा 2 -3 करोड़ की राशि एकत्र की जा सकी |

13. कार्यलय की कार्यप्रणाली में सुधार :
क. तकनीकी स्टाफ की सेवाओं का लिया जाना : इस पर विचार करते हुये कि कार्यलय में आयुर्वेद, यूनानी तथा सिद्ध का तकनीकी तथा अन्य सम्बन्धित कार्य देखने हेतु केवल एक स्थायी तकनीकी अधिकारी (सचिव, भारतीय चिकित्सा केन्द्रीय परिषद्) है, वर्तमान परिषद् ने कार्यलय कि सुचारू कार्य विधि हेतु स्नातकोत्तर अर्हता धारक 05 आयुर्वेद, 01 यूनानी तथा 01 सिद्ध विशेषज्ञों कि सेवायं ली | इन तकनिकी विशेषज्ञों ने आयुर्वेद, यूनानी तथा सिद्ध के परिदर्शन प्रतिवेदन का मूल्याकन करने तथा सम्बन्धित पद्धतियो के अन्य तकनीकी कार्य में सहायता करने का उत्तरदायित्व लिया | तकनीकी स्टाफ नियुक्त करके वर्तमान परिषद् भारतीय चिकित्सा पद्धति के महाविधालयों के परिदर्शन के कार्य का मूल्याकन करने के समयबद्ध कार्यक्रम को पूर्ण करने का प्रबन्ध कर सकी |
ख. जनसूचनाधिकार अधिकारी की सेवा का लिया जाना : कार्यलय स्टाफ की कमी के कारण जनसूचनाधिकार के अन्तर्गत मांगी गई सूचना समय पर भेजी नही जा रही थी तथा इस समस्या से निपटने के लिये एक जनसूचनाधिकार परामर्शदाता की सेवाय समेकित वेतन (Consolidated salary) के आधार पर ली जा रही हैं |
ग. विधि परामर्शदाता की सेवा का लिया जाना : यह पाया गया की पूर्व में बहुत से कोर्ट केस लम्बित पड़े थे तथा बहुत से केस कार्यलय में जनशक्ति की कमी के कारण परिषद् द्वारा दायर नही किये गये थे | इन कोर्ट केसों को देखने के लिये परिषद् द्वारा विधि परामर्शदाता तथा रिटेनर की सेवाय ली जा रही हैं |

14. कार्यलय में पूर्ण आधारभूत संरचना सभी सुधार : कार्यलय क्रियाविधि को कम्प्यूटरीकृत किया गया, इन्टरनेट की सुविधा उपलब्ध कराई गई तथा कार्यलय को पुन: सुसज्जित भी किया गया |